सोमवार, 27 फरवरी 2012

गोधरा के शहीदों को नमन

साबरमती एक्सप्रेस का S-6 कोच (चित्र: liveindia.tv से)
 
27 फरवरी 2002. 'आधुनिक' भारत के इतिहास का एक और काला दिन. इसी दिन इस 'स्वतंत्र' और "धर्मनिरपेक्ष" देश में सुबह 7:43 बजे गुजरात के गोधरा स्टेशन पर इसी देश के 58 नागरिकों (23 पुरुषों, 15 महिलाओं और 20 बच्चों) को साबरमती एक्सप्रेस के कोच S-6 में ज़िंदा जला दिया गया. उनका 'अपराध' शायद ये था कि वे अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार अयोध्या को श्रीराम की जन्मभूमि मानते थे और उसी अयोध्या की अपनी तीर्थयात्रा से लौट रहे थे.
मैंने सुना है कि इस देश में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. मैंने ये भी सुना है कि इस देश में मानवाधिकारों और महिला-अधिकारों की रक्षा के लिए भी अनेक प्रावधान हैं. लेकिन मुझे ये नहीं मालूम कि ये अधिकार हिंदुओं के लिए भी हैं या नहीं. सुना तो मैंने ये भी है कि इस देश का मीडिया बहुत 'जागरूक', 'निष्पक्ष' और 'ज़िम्मेदार' मीडिया है. मीडिया में गोधरा के बाद पूरे गुजरात में हुए दंगों की खबरें खूब सुनने को मिलीं, लेकिन अफसोस! गोधरा में मारे गए लोगों के परिवार की व्यथा विश्व को सुनाने का समय शायद किसी चैनल, किसी अखबार को नहीं मिला.

मंगलवार, 15 मार्च 2011

जापान की प्राकृतिक आपदा में निहित संदेश…

हाल ही में, जापान में भूकंप और सुनामी के बाद जो हुआ, क्या वह हमारे लिये एक चेतावनी नहीं है? स्वयं को आधुनिक कहने वाली वर्तमान सभ्यता का हमेशा से ये विचार रहा है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है। पश्चिमी विचारधारा ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलने के बजाय प्रकृति को जीतने का प्रयास किया और हमेशा इसमें विफलता पाई। मनुष्य चाहे स्वयं को कितना ही शक्तिशाली समझ ले, परंतु ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के द्वारा हर बार ये साबित हो जाता है कि प्रकृति के शक्ति के सामने मनुष्य की शक्ति नगण्य है।

हम स्वयं को किस आधार पर इतना उन्नत और शक्तिशाली मानते हैं? प्रकृति का कुछ मिनट का तांडव हमारे सारे घमण्ड को हर बार चूर-चूर कर देता है। हमारा मौसम विभाग अक्सर मौसम का सही पूर्वानुमान लगा पाने में विफल रहता है। हर साल सर्दियों में कोहरा छा जाने पर हमारी यातायात व्यवस्था, रेलगाड़ियाँ, हवाई जहाज़ सब रूक जाते हैं। कुछ महीनों पहले बर्फ पड़ी तो आधा यूरोप कई दिनों तक ठप पड़ा रहा। अभी कल-परसों जापान में और कुछ वर्षों पूर्व इंडोनेशिया से लेकर भारत तक सुनामी ने जो कहर बरपाया, उसकी तो याद भी हमें सिहराने को काफी है।

रविवार, 7 नवम्बर 2010

मेरा भारत महान है?

छद्म-सेक्युलर भारत!

यहाँ गुजरात दंगों का ज़िक्र होता है, लेकिन गोधरा का नहीं,
कंधमाल की बात होती है, लेकिन स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या की नहीं,
काश्मीर में सेना पर पत्थर फेंकने वाले "मासूम" युवाओं की बात होती है,
लेकिन काश्मीरी पण्डितों की नहीं।

अफज़ल और कसाब जेल में शान से रहते हैं, साध्वी प्रज्ञा जैसे संत यातनाएँ सहते हैं,
नक्सली और आतंकी "भटके हुए नौजवान" कहलाते हैं, और बजरंग दल, शिवसेना के कार्यकर्ता आतंकवादी बताये जाते हैं,
अरुँधती और गिलानी राष्ट्रद्रोह करके भी मुक्त हैं,संघ के देशभक्त कार्यकर्ता आतंक के झूठे आरोपों से त्रस्त हैं।

शायद हिंदू विरोध ही इस देश की शान है, क्या इसीलिये मेरा भारत महान है?

शुक्रवार, 5 नवम्बर 2010

दीपावली, आर्य चाणक्य और वर्तमान राजनेता

मित्रों, आप सभी को प्रकाश-पर्व दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ! दीपावली का उल्लेख हो और दीपों की बात न हो, ये संभव नहीं है। अमावस की रात में आने वाली दीपावली को ये छोटे-छोटे दीप ही रोशन करते हैं और हमें प्रेरणा देते हैं कि जिस तरह एक छोटा-सा दीपक अँधेरे को दूर कर देता है, उसी तरह हमारा एक छोटा प्रयास भी एक दिन कोई बड़ा परिवर्तन ला सकता है। बस! मन में उत्साह और अपने संकल्प की पूर्ति के लिये लगन होनी चाहिये।
ऐसी ही लगन आर्य चाणक्य के मन में थी और उन्होंने अपनी लगन से उसे पूरा करके दिखाया। अपने अदम्य उत्साह के बल पर उस एक अकेले व्यक्ति ने कितने सारे महान कार्य पूरे कर दिये। सिकंदर जैसे आक्रमणकारी को अपनी विशाल सेना के होते हुए भी सैनिकों सहित भारत से बाहर खदेड़ दिया। एक छोटे-से बालक को अपने योग्य-मार्गदर्शन में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। राजा धनानन्द की मज़बूत सत्ता को उखाड़कर सभी छोटे-बड़े राजाओं को मौर्य साम्राज्य के अधीन ले आए और पूरे भारत को फिर एक बार उसी तरह अखण्ड बना दिया, जैसा वह श्रीराम और श्रीकृष्ण के काल में था।

चाणक्य केवल एक विद्वान ब्राह्मण और अर्थशास्त्री ही नहीं, वरन् एक देशभक्त राजनीतिज्ञ भी थे। दीपावली के इस अवसर पर दीपों की बात निकली, तो मुझे चाणक्य के जीवन का एक प्रसंग आ रहा है। यूनान का एक दूत मौर्य साम्राज्य के मार्गदर्शक आर्य चाणक्य से मिलने के लिये गया। इतने बड़े साम्राज्य के निर्माता चाणक्य पाटलिपुत्र में गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटिय में निवास करते थे। रात का समय था। दूत ने देखा कि एक छोटा-सा दीप जल रहा है और उसके प्रकाश में कौटिल्य अपने लेखन में व्यस्त हैं। इस दूत के आने पर उन्होंने उसका स्वागत किया और जलता हुआ वह दीप बुझाकर एक दूसरा दीप जला दिया। दोनों में बात-चीत होने लगे। दूत ने कारण पूछा कि आखिर आपने पहला दीप बुझाकर दूसरा क्यों जलाया है? तब चाणक्य ने उत्तर दिया कि वह जो दीप है, वह मुझे शासकीय कार्य के लिये शासन की ओर से मिला है। उसका उपयोग मैं अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिये कैसे कर सकता हूँ? ये जो दूसरा दीप है, ये मेरा है। जब आप आए, तो मैं शासकीय कार्य कर रहा था। इसलिये पहला वाला दीप जल रहा था। लेकिन आपसे जो मेरा वार्तालाप चल रहा है, ये मेरा निजी कार्य है। इसलिये मैंने पहला वाला दीप बुझाकर दूसरा वाला जला दिया!

कथा भले ही छोटी-सी हो, लेकिन इसका मर्म बहुत गहरा है। हम हमेशा महापुरुषों की ऐसी अनेक कथाएँ और प्रसंग सुनते हैं, लेकिन जब हमारे सामने कोई ऐसा अवसर आता है, तो क्या हम स्वयं ऐसा व्यवहार करते हैं? हम इस बात पर गर्व करते हैं कि अतीत में भारत विश्व का सबसे शक्तिशाली, वैभव-संपन्न और समृद्ध राष्ट्र था, लेकिन क्या हम इस बात पर विचार करते हैं कि वर्तमान भारत इस दुःस्थिति में क्यों है? हम इस बात के लिये केवल विदेशी हमलावरों को दोष देकर अपने कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ सकते। विदेशी आक्रमणों की एक हजार वर्षों की श्रृँखला 1947 में टूट गई। लेकिन हमारे कुछ अदूरदर्शी और स्वार्थी राजनेताओं और शासकों की कृपा से देश आज भी असुरक्षित बना हुआ है। हम लगातार आंतरिक और बाह्य आक्रमणों से जूझ रहे हैं। क्या हमारे राजनेता आर्य चाणक्य से कोई सीख लेंगे?

आर्य चाणक्य जैसे महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अतीत में भारत विश्व-गुरु क्यों कहलाता था। अपने निजी कार्य के लिये शासकीय धन की एक पाई का भी प्रयोग न करने वाले उस महात्मा और शासकीय धन को अपने घर की संपत्ति समझने वाले वर्तमान राजनेताओं के बीच कोई तुलना भी नहीं की जा सकती। इनमें ज़मीन-आसमान का अंतर है और यही कारण है कि तत्कालीन बिश्व-गुरु भारत और वर्तमान संकट-ग्रस्त भारत में भी इतना अंतर है।

यदि हमें भारत को पुनः विश्व-गुरु बनाना है, तो फिर एक बार उसी मार्ग को अपनाना पड़ेगा, जो श्रीराम, श्रीकृष्ण और आर्य चाणक्य ने हमें दिखाया है। हम अमरीका, चीन, यूरोप, रूस या किसी भी अन्य देश की नकल करके कभी आगे बढ़ सकते। जब तक हम नकल करते रहेंगे, तब तक हमेशा किसी न किसी से पीछे ही रहेंगे। यदि हम भारत को इसका खोया हुआ वैभव और स्थान पुनः दिलाना चाहते हैं, तो इसके लिये दो बातों को अपनाना अनिवार्य है- निःस्वार्थ देशभक्ति और अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन। ये दो ऐसे तत्व हैं, जिन्हें आप, मैं और देश का हर सामान्य नागरिक भी सहजता से अपना सकता है। हमें याद रखना चाहिये कि परिवर्तन तभी हो सकता है, जब समाज जागृत हो और समाज जागृत तभी होगा जब इसका प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्य का ईमानदारी और निष्ठा से पालन करे।

आइये, इस दीपावली पर एक दीप अपने राष्ट्र के नाम जलाएँ और ये संकल्प लें कि हम राष्ट्र-निर्माण में हरसंभव अपना योगदान देंगे। हर परिवर्तन अब हमें ही करना है क्योंकि राजनेताओं और राजनीति से तो अब कोई आशा करना भी शायद व्यर्थ है…शुभ दीपावली!!

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

कश्मीरी पण्डितों के दर्द को व्यक्त करती एक कविता…

मेरी बेटी की ओढ़नी
तार-तार की गई-
सब खामोश रहे।

मुझे विवश किया गया
अपना घर-द्वार छोड़कर
संस्थापित से विस्थापित बनने के लिये
कोई कुछ नहीं बोला।

मैं अपने परिवार के साथ
न्याय की गुहार लगाते हुए
वर्षों से दिल्ली के फुटपाथ पर हूँ
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कोई भी मानवाधिकारवादी
कोई भी टीवी चैनल
कोई भी राजनीतिक ध्वजाधारी
मेरे विषय में चर्चा नहीं करता,
मेरा आर्त्तनाद नहीं बनता
किसी भी प्रगतिवादी
साहित्यकार की
कथा का विषय।
मेरी त्रासभरी आँखें नहीं बनतीं
किसी भी जनवादी पत्रिका का मुख-पृष्ठ

मैं अपने प्रान्त से बहिष्कृत
अपने परिवेश से तिरस्कृत

अपने अवांछित अस्तित्व के लिये
हर कदम पे दण्डित हूँ
क्योंकि मैं
एक कश्मीरी पण्डित हूँ।

शायद यह मेरे पूर्व जन्म के पापों का
फलस्वरूप परिताप है
क्योंकि कश्मीर में हिन्दू होना
आज एक विडम्बना है, अभिशाप है!

(पाञ्चजन्य, नई दिल्ली 4 जुलाई 2009 अंक में प्रकाशित श्री शिव ओम अम्बर की कविता)

शुक्रवार, 7 मई 2010

तस्वीरों के पार

मैं अपनी तस्वीरों में हूँ भी और नहीं भी
मैं अपने पोस्टर में हूँ भी और नहीं भी
इसमें न कोई विरोध
न कोई विरोधाभास.

तस्वीर आत्मा जैसी नहीं है
वह तो पानी में भीगती है
आग में जलती है
बह भीगे या जले
मुझे कुछ नहीं होता

आप मुझे मेरी तस्वीर में या पोस्टर में
खोजने का मिथ्या प्रयत्न न करें.
मैं तो निश्चिंत बैठा हूँ
अपने आत्मविश्वास में-
अपनी वाणी, व्यवहार और कर्म में
आप मुझे मेरे कर्मों से जानें
कर्म ही मेरा जीवन-काव्य है
लयताल है.

घर में गीतासार
आंगन में कर्मधार
आप सभी के लिए अकारण आर्द्र
कोमल प्यार है

आप मुझे तस्वीर में नहीं
पसीने की खुशबू में खोजें
योजनाओं के अम्बार की थकावट में
मेरी आवाज़ की गूँज पहचानें
मेरी आँखों में आप ही की छवि है।

(श्री नरेंद्र मोदी की कविता का पाञ्चजन्य में प्रकाशित हिन्दी अनुवाद)

2011 की जनगणना में हमारी भूमिका

2011 की जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति से उसकी मातृभाषा पूछी जाएगी। चूँकि भारत एक बहु-भाषी देश है,अतः प्रत्येक व्यक्ति से यह भी पूछा जाएगा कि उसे और कौन-सी भाषाओं का ज्ञान है। जिनकी मातृभाषा कोई भारतीय भाषा है, स्वाभाविक रूप से उन्हें कम से कम 50% संस्कृत शब्दों का उच्चारण करना आता है। जैसे- जल, वायु, अग्नि, मार्ग, नेत्र, विवाह, भोजन आदि। इसका कारण यह है कि संस्कृत ही समस्त भाषाओं की जननी है। करोड़ों भारतीय,विशेषतः हिन्दू,अनेक स्तोत्र-मंत्रों, आरतियों,गीता-पाठ आदि के माध्यम से प्रातः काल से रात्रि तक दिन-भर संस्कृत का ही उच्चारण करते रहते हैं। अधिकांश हिन्दुओं के नाम भी संस्कृतनिष्ठ ही होते हैं, जैसे- राजेन्द्र, सुरेश, सुरेन्द्र, मीनाक्षी, सुरभि, निधि, स्वाति, सुमंगल आदि। हम दिन में अनेक बार इन नामों का उच्चारण करते हैं। अतः स्पष्ट है कि हममें से अधिकांश भारतीयों को संस्कृत का थोड़ा बहुत ज्ञान अवश्य है और हम इस भाषा का बड़े पैमाने पर प्रयोग भी करते हैं।

अतः जिन भारतीय नागरिकों की प्रथम भाषा संस्कृत न हो, उन सभी को अवश्य ही अपनी द्वितीय-भाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख करना चाहिए। तीसरी भाषा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में किसी भी अन्य भारतीय भाषा का नाम लिया जा सकता है। पिछली जनगणना में 2,26,449 नागरिकों ने अपनी प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेज़ी का उल्लेख किया था। 8,60,00,000 नागरिकों ने इसे अपनी द्वितीय भाषा और 3,90,00,000 नागरिकों ने तीसरी भाषा बताया। इन सभी आँकड़ों को जोड़कर यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि देश में हिन्दी के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली या सर्वाधिक ज्ञात भाषा अंग्रेज़ी है। यह कुछ और नहीं, बल्कि भारतीयों की गौरवहीनता का ही परिणाम है, अन्यथा भारत में जो स्थान संस्कृत का है, उसे अंग्रेज़ी कैसे हथिया लेती? संस्कृत विश्व की प्रथम भाषा होने के साथ-साथ मानव-इतिहास की सर्वाधिक समृद्ध भाषा भी है। यह अत्यंत दुःखद है कि शेष विश्व ने पहले ही उसे लुप्तप्राय भाषाओं की श्रेणी में डाल दिया है। परंतु, इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि संस्कृत के जन्मस्थान भारत में भी इसे हाशिये पर डालने का प्रयास चल रहा है। जो भाषा हमारी सभी भाषाओं की जननी है, क्या उसकी रक्षा किये बिना हम अपनी मातृभाषा की रक्षा कर सकेंगे? यह संस्कृत की उपेक्षा का ही परिणाम है कि आज सभी भाषाएँ मिश्रित भाषाएँ बन गईं हैं और कुछ लोग निर्लज्जतापूर्वक यह आग्रह करते हैं कि इन भाषाओं को इसी प्रकार उनके अशुद्ध रूप में ही प्रयोग किया जाए। यह केवल एक भूल ही नहीं,वरन् हमारी अपनी भारतीय भाषाओं को नष्ट करने का अपराध है, जिसमें हम सभी जाने-अनजाने सम्मिलित हो रहे हैं। यह हम सभी का कर्तव्य है कि हम संस्कृत को नष्ट होने से बचाने में योगदान दें,ताकि हमारी सभी भारतीय भाषाओं की भी रक्षा की जा सके। अतः यह आवश्यक है कि हम सभी अपनी प्रथम,द्वितीय अथवा तृतीय भाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख अवश्य करें तथा साथ ही अपने दैनिक जीवन में संस्कृत के अधिक-से-अधिक शब्दों का प्रयोग भी करें। यदि हम अपने दैनिक वार्तालाप में अधिक-से-अधिक संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करने लगेंगे,तो इससे न केवल संस्कृत का प्रचार-प्रसार होगा,वरन् हमारी अन्य भारतीय भाषाएँ का शुद्ध स्वरूप भी बना रहेगा। संस्कृत सभी भाषाओं की माँ है। जिस प्रकार माता का दूध जीवनदायी होता है,उसी प्रकार संस्कृत का प्रयोग अन्य सभी भारतीय भाषाओं को शक्ति प्रदान करेगा व साथ ही इससे समाज का मन और बुद्धि भी स्वस्थ रहेंगे।

पिछली जनगणना में अपनी मातृभाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख करने वालों की संख्या 14,135 है। अतः सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं की सूची में इसका स्थान 118वां है। वहीं दूसरी ओर, 51, 728 नागरिकों ने अपनी मातृभाषा अरबी बताई है। परिणामस्वरूप, सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं की सूची में अरबी का स्थान 78वां, अर्थात् संस्कृत से भी ऊपर, है। यह कैसा क्रूर मज़ाक है! क्या भारत में अरबी की संतानें अधिक हैं और संस्कृत के सपूत कम?अतः संस्कृत को जनभाषा बनाने के लिये एक अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है और हम सभी को इसमें अवश्य योगदान करना चाहिए।

यह केवल हमारी उदासीनता व अज्ञान का ही परिणाम है कि सहस्त्रों शब्दों के माध्यम से अनेक भाषाओं में प्रयोग की जाने वाली और जाने-अनजाने में लाखों-करोड़ों भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली संस्कृत भाषा को आज लुप्त-प्राय कहने का साहस किया जा रहा है। जिस भाषा में विश्व के सर्वश्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई, जिस भाषा में वेदों, उपनिषदों व पुराणों का लेखन हुआ, जिस भाषा में सर्वोच्च कोटि के महाकाव्य रचे गए, वह भाषा आज अपने ही देश में उपेक्षित है। यह हम सभी का कर्तव्य है कि हम सभी संस्कृत को पुनर्जीवित करने में अपना योगदान दें,ताकि यह भाषा विश्व-मंच पर अपना गौरव पुनः प्राप्त कर सके। यदि हमने इस कार्य में सहयोग न किया,तो यह एक ऐसा अपराध होगा, जिसके लिये आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

अतः आइये, हम सभी मिलकर संस्कृत के प्रसार में अपना योगदान करें तथा 2011 की जनगणना में अपनी प्रथम, द्वितीय अथवा तृतीय भाषा के रूप में अवश्य ही संस्कृत का उल्लेख करें।

-सुमन्त.
(संस्कृत-भारती, नई दिल्ली के श्री श्रीश देवपुजारी के लेख के आधार पर)

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

वरुण गाँधी पर NSA; आतंकियों पर क्या?

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से भा.ज.पा. के उम्मीदवार वरुण गाँधी के कुछ भाषणों को लेकर देश भर में विवाद जारी है . वरुण पर आरोप है की उन्होंने अपने भाषण में एक धर्म के लोगो को दूसरे संप्रदाय के विरुद्ध भड़काया है, जो कि देश की एकता के लिए घातक है. स्वाभाविक रूप से इस प्रकार के भाषण की चर्चा होते ही देश भर में हंगामा और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. चूंकि, ये चुनाव का मौसम है, इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इस मुद्दे से लाभ उठाने में पीछे नहीं रहना चाहता. वरुण गाँधी को तुंरत गिरफ्तार कर लिया गया और इस समय वे उत्तर प्रदेश की एटा जेल में बंद हैं. उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया गया है और चूंकि यह मामला अदालत में है, इसलिए मै इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना उचित नहीं समझता. लेकिन एक मतदाता होने के नाते मुझे देश की वर्तमान राजनितिक स्थिति और राजनीति के गिरते स्तर को देखकर बहुत दुःख होता है और इस पर अपने विचार अन्य मतदाताओं, ख़ास तौर पर युवाओं, तक पहुंचाना मै आवश्यक समझता हूँ .
मै किसी व्यक्ति, पार्टी या विचार धारा का समर्थन या विरोध नहीं करूँगा. भारत विश्व का सबसे बड़ा लोक-तंत्र है और लोक-तंत्र की सबसे पहली और महत्वपूर्ण शर्त है, सहनशीलता और निष्पक्षता. हम स्वयं से पूछे कि क्या हम सहनशील और निष्पक्ष हैं? हम जिस प्रसन्नता के साथ अपनी समर्थक विचारधारा का स्वागत करते हैं, क्या उतनी ही प्रसन्नता के साथ विरोधी विचारो को भी स्वीकार कर पाते हैं? साथ ही हम स्वयं से यह भी सवाल करे कि क्या हम किसी विषय पर निष्पक्ष होकर विचार करते हैं, या हम अपने पूर्वाग्रहों(Prejudices) से ग्रस्त हैं? मुझे दुःख है कि भारतीय राजनीति और संपूर्ण समाज से ही यह दो महत्वपूर्ण तत्व धीरे धीरे समाप्त होते हुए दिखाई दे रहे हैं.और शायद यही देश कि वर्त्तमान स्थिति का एक बड़ा कारण भी है. ऐसे मे मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि हमारा भविष्य क्या है?राजनेताओ से अपेक्षा की जाती है कि वे समाज को सही दिशा दें, लेकिन यथार्थ में यही दिखाई देता है कि वे केवल अपने स्वार्थ के लिए समाज को बांटने में ही व्यस्त रहते हैं. जिन राजनितिक दलों से ये अपेक्षित है कि वे देश को अपराधो से सुरक्षित रखें, वे स्वयं ही अपराधो में लिप्त हैं. हमारी संसद और विधान सभाओं में ऐसे अनेक मंत्री और सांसद-विधायक हैं, जिन पर हत्या, लूटपाट, अपहरण और इसी तरह के न जाने कितने गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं. परन्तु चिंता का विषय यह है कि ऐसे लोग चुनावो में अपने धन-बल और बाहु-बल के कारण जीतकर विधायिका में पहुच रहे हैं. जब इनके हाथो में ही कानून बनाने और उसे परिवर्तित करने का अधिकार आ गया है, तो देश की कानून व्यवस्था मजबूत होने कि उम्मीद कैसे की जा सकती है? अधिक गंभीर तथ्य यह है कि देश की सेवा और रक्षा करने का दावा करने वाले इन राजनैतिक दलों में से कोई एक दल भी इन अपराधिक प्रवृत्ति के उम्मीदवारों का विरोध करने के आगे नहीं आया है. उल्टे कही कही तो ऐसी स्थिति दिखाई देती है कि जैसे इन दलों में अपराधियों को टिकट देने की होड़ मची हुई है. यहाँ तक कि कुछ उम्मीदवार तो ऐसे हैं, जो जेल से ही चुनाव लड़ते रहे हैं. एक मतदाता होने के नाते मुझे ऐसा लगता है कि इस पर रोक लगनी चाहिए. कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे अदालत जमानत तक दिए जाने के योग्य न समझती हो, उसे एक पूरे क्षेत्र के लाखो नागरिको के भविष्य के निर्धारण का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? जब तक ऐसा कानून नहीं बन जाता, तब तक इस बात का ध्यान रखने की पूरी जिम्मेदारी मतदाताओं की है, कि चाहे कुछ भी कारण हो, पर हम ऐसे उम्मीदवारों के समर्थन में वोट न दे.
मुझे दुःख है कि आज तक किसी सरकार ने इस विषय पर ध्यान देना आवश्यक नहीं समझा. कभी कभी तो लगता है कि अधिकतर सरकारों ने किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान देना आवश्यक नहीं समझा और सत्ताधीश केवल अपने स्वार्थो की पूर्ति के प्रयासों में ही व्यस्त रहे. परिणाम यह हुआ की आजादी के इतने वर्षो बाद भी हम भूख, गरीबी, अशिक्षा और बेरोज़गारी जैसी मूलभूत समस्यायों से ही जूझ रहे हैं. साथ ही अब देश की आतंरिक सुरक्षा पर भी लगातार खतरा बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. लेकिन लगता है कि राजनितिक दलों के पास इन सब समस्यायों कि गंभीरता के बारे में सोचने का समय और इच्छा शक्ति है ही नहीं. उन्हें केवल अपने वोटो कि चिंता है. यही कारण है कि देश में लगातार आतंकवादी हमले हो रहे हैं, सेना और सुरक्षा बालो के जवान हर दिन देश की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे रहे हैं, लेकिन फिर भी खतरा लगातार बढ़ ही रहा है. राजनेता हमें कानून और अदालत का सम्मान करने का पाठ पढाते हैं, लेकिन, अदालत ने जिन्हें दोषी करार देकर फासी की सजा सुनाई है, वे अपराधी आज भी जीवित हैं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के हत्यारों हो, या संसद पर हमले का दोषी, इनमे से किसी के भी मामले में अब तक अदालत के निर्णय का पालन नहीं हुआ है. ये सही है कि इन्हें राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करने का अधिकार है, जिसका उन्होंने उपयौग किया है, लेकिन यह भी तो सच है कि इस विषय पर अंतिम फैसला गृह-मंत्रालय को लेना है और राष्ट्रपति को अपनी सिफारिश भेजनी है. तो ये आज तक क्यों नहीं हुआ? अधिकांश राजनैतिक दलों की सहानुभूति नागरिको के प्रति कम और अपराधियों के प्रति अधिक दिखाई देती है. उनके पास आतंकियों की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने का समय है, लेकिन उन्हें किसी शहीद सैनिक के परिवार की चिंता नहीं है. इससे अधिक दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा, कि संसद पर हमले के दौरान मारे गए शहीदों के परिजनों ने उस हमले के दोषी आतंकवादी को फासी न दिए जाने के विरोध में अपने सभी पदक(medal) सरकार को लौटा दिए, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ. हमारे नेताओ के मन में बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति है, लेकिन कश्मीर से निकाले जाकर पिछले २० वर्षो से अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर हजारो नागरिको की चिंता करने का समय नहीं है. नेताओ के पास दिल्ली के बाटला हाउस में हुई मुठभेड़ पर प्रश्न उठाने का समय है, लेकिन उसमे मारे गए पुलिस अधिकारी की मृत्यु के प्रति शोक व्यक्त करने का समय नहीं है. ऐसे अनेक मुद्दे हैं, जिनके सम्बन्ध में हमारे राजनैतिक दलों का आचरण संदेहास्पद रहा है. अधिक दुःख इस बात का है कि मीडिया, जिसे लोक-तंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, भी निष्पक्ष नहीं दिखाई देता. अधिकांश समाचार चैनल देश की समस्यायों और चुनौतियों के प्रति नागरिको को जागृत करने से अधिक महत्व अन्य गतिविधियों को देते हुए ही दिखाई देते हैं. जबकि, जागृत एवं निष्पक्ष मीडिया समाज को सही दिशा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
इस स्थिति को सुधारने के लिए जरुरी है कि देश के नागरिक स्वयं जागृत हों और अपने कर्तव्यों का पालन करे. हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर देश को महत्व देना सीखे. चुनाव में मतदान का अधिकार हमारा सबसे बड़ा अस्त्र है और मतदान केवल हमारा अधिकार ही नहीं, बल्कि यह राष्ट्रीय कर्तव्य भी है. अतः ये महत्वपूर्ण है कि हम मतदान अवश्य करे और इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपना वोट केवल योग्य उम्मीदवार को दे. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम किस राजनैतिक दल या विचारधारा के समर्थक हैं. हम चाहे जिसे चुने, पर हमारा लक्ष्य देश की सुरक्षा और विकास ही होना चाहिए. इस कार्य में युवाओं कि विशेष भूमिका है. युवा पीढी ही देश का भविष्य है. अतः आवश्यक है कि युवा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक गतिविधियों में लगाये. हमें याद रखना चाहिए कि यदि हम आज अपनी ऊर्जा का दुरुपयोग करते रहे और देश की समस्यायों से मुह मोड़ कर बचने कि कोशिश करते रहे, तो इसका परिणाम भी हमें ही भुगतना होगा. अतः जरुरी ये है कि युवा पीढी जागृत होकर चुनावो में अपने मताधिकार का प्रयोग करे और अधिक से अधिक लोगो को मतदान के लिए प्रेरित करे. देश की सभी चुनौतियाँ और सभी समस्याए हम सभी की है और हम सब साथ मिलकर ही इन्हें कुचल सकते हैं. यह भी धयन रखना होगा की एक सक्षम और इमानदार सरकार ही इन समस्यायों का अंत कर सकती है. अतः आवश्यक है कि हम सब मिलकर मतदान के अपने कर्त्तव्य का पालन करे, ताकि विश्व का सबसे बड़ा लोक-तंत्र, भारत, विश्व का सबसे सफल, सुरक्षित और विकसित लोक-तंत्र भी बन सके.

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

प्रकृति बचेगी- विश्व बचेगा

आजकल अक्सर GLOBAL WARMING (वैश्विक तापमान-वृद्धि) नामक शब्द की चर्चा सुनाई देती है। पृथ्वी पर बढ़ती जनसँख्या, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित औद्योगिकीकरण तथा असीमित प्रदुषण आदि के कारण वायुमंडल के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ तेज़ी से पिघलती जा रही है, जिसके कारण महासागरों का जल-स्तर बढ़ता जा रहा है और तटीय इलाकों के डूब जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार समुद्री तटों पर बसे विश्व के १९ प्रमुख शहरों में से १६ शहर इस खतरे की चपेट में हैं। दूसरी ओर, वातावरण में तापमान बढ़ने के कारण मौसम-चक्र भी असंतुलित होता जा रहा है। इन सब परिवर्तनों के कारण निकट भविष्य में होने वाले दुष्प्रभावों तथा अंततः संपूर्ण पृथ्वी के विनाश की आशंका के कारण समस्त विश्व के प्रकृति-प्रेमी, पर्यावरणविद तथा वैज्ञानिक अत्यधिक चिंतित हैं। इस सभी की यह चेतावनी है की यदि पृथ्वी पर जीवन को बचाए रखना है, तो GLOBAL WARMING को कम करने के लिए तुंरत बड़े पैमाने पर उपाय करना तथा प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करना अति-आवश्यक है; अन्यथा हमारा अंत निश्चित है। इस चेतावनी का अर्थ स्पष्ट है-"प्रकृति बचेगी-विश्व बचेगा !!"
'प्रकृति' वस्तुतः पाँच प्रमुख तत्वों -पृथ्वी(मृदा), अग्नि, वायु, जल तथा आकाश- का समन्वय है। इन पञ्च तत्वों के मिश्रण से ही संपूर्ण सृष्टि का निर्माण हुआ है। सृष्टि के कण-कण में, प्रत्येक निर्जीव तथा सजीव में, सर्वत्र ये पाँच तत्व विद्यमान हैं। हमारे ग्रह पर जीवन की उत्पत्ति, अस्तित्व तथा विकास इन पाँच तत्वों के उचित संतुलन के कारण ही सम्भव हो सका है। सृष्टि की संपूर्ण विविधता भी इन तत्वों के विभिन्न संयोगों के कारण ही बनती हैं। अतः पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखने के लिए इन तत्वों के बीच उचित संतुलन को बिगड़ने न देना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

सोमवार, 8 सितम्बर 2008

'हिन्दी-दिवस'

भारत में प्रतिवर्ष १४ सितम्बर का दिन 'हिन्दी-दिवस' के रूप में मनाया जाता है. इस दिन विभिन्न शासकीय-अशासकीय कार्यालयों, शिक्षा संस्थाओं आदि में विविध गोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. कहीं-कहीं 'हिन्दी पखवाडा' तथा 'राष्ट्रभाषा सप्ताह' इत्यादि भी मनाये जाते हैं. विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा भी है. अतः इसके प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करने के लिए ऐसे आयोजन स्वाभाविक ही हैं. परन्तु, दुःख का विषय यह है की समय के साथ-साथ ये आयोजन केवल औपचारिकता मात्र बनते जा रहे हैं.
राष्ट्रगीत,राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रभाषा किसी भी राष्ट्र के मानबिंदु होते हैं. इनका रक्षण, पोषण तथा प्रसार करना प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है.अतः राष्ट्र भाषा होने के कारन हिन्दी का भी व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना आवश्यक है. परन्तु, ऐसा लगता है की भारत में कभी भी इस दृष्टि से विचार नहीं किया गया. स्वतंत्रता के बाद भी पश्चिमी शिक्षा-पद्धति को ही जारी रखने के कारण पश्चिम को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई. इसी प्रकार अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वालों को ही विद्वान मानने की मानसिकता भी दिखाई देती है. इसका दुखद पहलू यह है कि केवल सामान्य जनता में ही नहीं, वरन, शासकों के मन में भी यही भावना विद्यमान है.इसका एक उदहारण यह है कि अपने पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने जब सांसद के रूप में अपना प्रथम भाषण हिन्दी में प्रारम्भ किया, तो इसका विरोध करते हुए अनेक संसद-सदस्य उठकर सदन से बाहर चले गए. आज भी संसद में होने वाली बहस तथा चर्चाओं में बड़े पैमाने पर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग होता हुआ दिखाई देता है।

पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के नाम पर प्रत्येक क्षेत्र का पश्चिमीकरण करने का प्रयास लगातार जारी है।इसके साथ-साथ ही हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेज़ी को अधिकाधिक प्रसारित करने का कार्य भी चल रहा है।यह प्रचार भी किया जा रहा है की वैश्वीकरण के इस दौर में यदि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो अंग्रेज़ी का प्रयोग अनिवार्य है।इसी दुष्प्रचार से भ्रमित होकर छात्रों तथा अभिभावकों में अंग्रेज़ी माध्यम में ही शिक्षा प्राप्त करने की होड़ दिखाई देती है।परन्तु,वैज्ञानिक शोध इस बात को सिद्ध कर चुके हैं की बच्चों के मस्तिष्क, बुद्धि एवं तर्क शक्ति के सहज एवं संपूर्ण विकास के लिए मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना ही सर्वाधिक सहायक है।इसी प्रकार यह तर्क भी ग़लत है की अंग्रेज़ी को अपनाए बिना प्रगति नहीं की जा सकती।फ्रांस, जर्मनी,जापान चीन आदि अनेक देश अपने व्यापार एवं व्यव्हार में सदैव सर्वत्र अपनी-अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं।यदि अंग्रेज़ी के प्रयोग के बिना भी ये सभी देश विकसित हो सकते हैं, तो भारत क्यो नही?यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की एक भाषा के रूप में मेरा अंग्रेज़ी अथवा किसी अन्य भाषा के प्रति विरोध या विद्वेष नहीं है।परन्तु, मैं अंग्रेज़ी के अनावश्यक प्रयोग तथा प्रत्येक क्षेत्र में किए जा रहे अंधाधुंध अंग्रेजीकरण का विरोधी हूँ.विदेश व्यापर, सॉफ्टवेर, कॉल सेण्टर आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें अंग्रेज़ी का प्रयोग आवश्यक एवं स्वाभाविक है.लेकिन, दैनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अंग्रेज़ी का प्रयोग अनावश्यक तो है ही, साथ ही, यह हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए हानिकारक भी है.अतः एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए पहली आवश्यकता यह है कि हम हिन्दी को हीन मानकर तिरस्कृत करने की बजाय उस पर गर्व करें एवं दैनिक जीवन में आग्रहपूर्वक इसका अधिकाधिक प्रयोग एवं प्रचार-प्रसार करें.
हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में से एक है।६६ से अधिक देशों में हिन्दी जानने वाले लोग रहते हैं.विश्व के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा सीखने की व्यवस्था है.अपनी हिन्दी फिल्मों तथा गीत-संगीत का जादू सम्पूर्ण विश्व को मोहित कर रहा है.यह निश्चित ही हम सभी के लिए गर्व का विषय है.लेकिन, दूसरी और दुखद पहलू यह भी है की धीरे-धीरे अपने ही देश में हिन्दी उपेक्षित हो रही है. वित्ताकोशों(बैंक्स), कार्यालयों, शिक्षण-संस्थाओं इत्यादि में हिन्दी का प्रयोग लगातार कम होता जा रहा है. बाजारों तथा दुकानों में बिकने वाली सामान्य वस्तुओं जैसे दवाएं,साबुन इत्यादि से लेकर बड़े-बड़े उद्योगों तक में सर्वत्र अंग्रेज़ी का प्रयोग ही अधिक दिखाई देता है.यहाँ तक की हमारे देश की शासकीय विमान-सेवा का नाम भी राष्ट्र-भासः में न होकर अंग्रेज़ी में ही है . यह स्थिति बदलनी चाहिए.

भारत विश्व के प्रमुख एवं महत्वपूर्ण देशों में से एक है. संपूर्ण विश्व के विकास एवं सकल मानव-जाति के कल्याण में भारत के योगदान को उपेक्षित नहीं किया जा सकता.संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही भारत इसका सक्रिय सदस्य रहा है.इसके द्वारा संचालित सभी कार्यक्रमों एवं अभियानों को सफल बनने में भारत ने सदैव ही पूर्ण सहयोग दिया है.परन्तु, दुःख का विषय है कि इसकी अधिकृत भाषाओँ की सूची में अंग्रेज़ी, चीनी, फ्रेंच, रूसी, अरबी इत्यादि भाषों को तो स्थान दिया गया है, परन्तु, करोड़ों लोगो द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिन्दी भाषा को अब तक उस सूची में स्थान नहीं मिल सका है.इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी को स्वयं अपने देश में ही यथोचित सम्मान नहीं मिल रहा है. संयुक राष्ट्र संघ की सभाओं एवं बैठकों को संबोधित करनेवाले हमारे सभी प्रधानमंत्रियों में से श्री वाजपेयी के अलावा शायद ही किसी और ने इस मंच पर हिन्दी का प्रयोग किया है.
जिस प्रकार यह सत्य है की हिन्दी की चिंताजनक स्थिति के लिए हम सभी दोषी हैं, उसी प्रकार यह भी सत्य है की इसके विकास एवं प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करना भी हम सभी का उत्तरदायित्व है. यदि हम अपने सामान्य दैनिक जीवन में छोटी-छोटी बैटन का ध्यान रखें एवं कुछ सरल सुझावों का पालन करें, तो हम सभी अपने अल्प प्रयास के द्वारा ही हिन्दी के विकास में बड़ा योगदान दे सकते हैं. हमें अपने दैनिक वार्तालाप में हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए. समस्त पात्र व्यव्हार का माद्यम हिन्दी ही होना चाहिए.कार्यालयों,न्यायालयों,शिक्षा-संस्थाओं आदि को भेजे जाने वाले आवेदन-पत्र इत्यादि भी हिन्दी में ही भेजें. अंतरताना (इन्टरनेट) पर अनु-डाक(ऐ-मेल) भेजनेवाले भी सरलता से हिन्दी का प्रयोग कर सके हैं. आजकल अनेक वेब-साइटों पर हिन्दी में -मेल भेजने की सुविधा उपलब्ध है.इसी प्रकार अनेक लिप्यान्तरण (ट्रांस्लितेरेशन) सॉफ्टवेर भी विकसित हो चुके हैं, जिनके द्वारा सरलता से हिन्दी में लिखा जाता है. जैसे :- यदि हम अंग्रेज़ी में 'नमस्ते' लिखें, तो यह संगणक के पटल(स्क्रीन) पर हिन्दी में 'नमस्ते' लिखा हुआ दिखाई देगा.सचल दूरभाष(मोबाइल फोन्स) में भी हमें हिन्दी अ विकल्प चुनना चाहिए एवं संदेश आदि भी हिन्दी में ही भेजने चाहिए.इसी प्रकार अपने घरों के बाहर लगाई जाने वाली नाम-पट्टिका(नेम-प्लेट) भी हम हिन्दी में ही लगवाएं तथा विभिन्न अवसरों पर भेजे जाने वाले बधाई संदेश, शोक संदेश आदि भी हिन्दी में ही भेजें.इस प्रकार की चोटी-चोटी बों को अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति हिन्दी के विकास में योगदान दे सकता है.विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी स्वयं हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करते हुए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित किया जन चाहिए.अहिन्दी भाषी राज्यों के लोगों को भी हीनी के महत्व एवं आवश्यकता की जानकारी दी जनि चाहिए.जिस प्रकार हम अंग्रेज़ी आदि विदेशी भाषाओं को सीखने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक भारतीय को हीनी भी सीखनी चाहिए.
परन्तु,केवल सामान्य जनों एवं कुछ संस्थाओं के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं.शासन को भी इस विषय में प्रयास करने होंगे.हिन्दी के विकास के लिए कार्य करनेवाले लेखकों,कवियों,गायकों,संगीतकारों एवं अन्य कलाकारों को पुरस्कृत किया जन चाहिए.सभी विदेशी नेताओं, राजनयिकों एवं प्रतिनिधियों से होने वाली औपचारिक चर्चाओं, बैठकों तथा वार्तालाप आदि भी अनुवादकों तथा दुभाषियों की सहायता से हिन्दी में ही होने चाहिए.इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं में देश का प्रतिनिधित्वा करनेवाले खिलाड़ियों के गणवेश पर अंग्रेज़ी में 'इंडिया' लिखने की बजाय हिन्दी में 'भारत' लिखा जन चाहिए. ऐसे छोटे-छोटे कार्य हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत लाभदायक होंगे।

प्रत्येक भारतीय के मन में हिन्दी के प्रति गर्व एवं प्रेम की भावना उत्पन्न करना हम सभी का कर्तव्य है. अतः हमें प्रयास करना चाहिए की 'हिन्दी-दिवस' जैसे आयोजन केवल औपचारिकता मात्र न रहकर हिन्दी के प्रति सम्मान प्रकट करने का मध्यम बनें.अन्यथा, यदि हमारे द्वारा हिन्दी की इसी प्रकार उपेक्षा होती रही, तो सम्भव है की हिन्दी भाषा के समाप्त होने का दुखद-काल भी हमें अपनी आंखों से देखना पड़े और आने वाली पीढियों के लिए १४ सितम्बर का दिन हिन्दी के प्रति सम्मान का दिन बन्ने की बजाय हिन्दी का 'स्मृति-दिवस' बनकर रह जाए. यदि ऐसा हुआ, तो इसके जिम्मेदार हम सब ही होंगे.